Kavita & Shayari

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मेरा बचपन

मेरा बचपन
कह दूँ बचपन की अपनी कहानी, जीवन की थी वो अनमोल निशानी। कुछ बातें लगती नई हमारी, कुछ हो गई है पुरानी।   मिट्टी के घरोंदे बनाना और बारिश में कागज की कश्ती थी चलानी। शीशे के कंचे थे खेल हमारे और दादी-नानी की प्यारी कहानी।   थे रंग बिखरे हजार, पर कोरे कागजों पर थी सजानी। इंद्रधनुष के सतरंगी ने ख्वाबों पे लगाई थी निशानी।   पतंगों से चाहत चाँद को छूने की थी, पर तितली थी मेरी दीवानी। बागों में था रस चुराना और फूलों की खुशबु लगती थी सुहानी।   करता था गलतियां सारे, पर उसमे भी थी नादानी। न देखा अपना पराया, बस हर रिश्ते को थी निभानी।   ना था कुछ खोने का डर, हर पल थी बडी ह
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एक नया मोड़

एक नया मोड़
ना जाने कैसे कैसे मोड़ पे खुद को खड़ा पता हूँ, किस मोड़ पे मोडू, इसी दुबिधा में पड़ जाता हूँ।
जिस मोड़ पे जाता हूँ, पीछे कुछ छोड़ जाता हूँ, आधी दूर चलकर फिर वहीँ रुक जाता हूँ।
जो पीछे छूटे मोड़, उसकी सोच में पड़ जाता हूँ, ना जाने कैसे कैसे मोड़ पे खुद को खड़ा पता हूँ।
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अक्सर तुम याद आ जाते हो
पता है, अक्सर तुम याद आ जाते हो।   हर फूल की नरमी में, सूरज की तपती गर्मी में। इन सरसराती हवाओं में, बादलों की हर छाओं में। अक्सर तुम याद आ जाते हो।   पहली बारिश की बूंदों में, माटी की सोंधी खुशबू में। रात की निखरी चांदनी में, सूरज की हर रौशनी में। अक्सर तुम याद आ जाते हो।   पर्वत के ऊंचाइयों में, सागर के गहराईओं में। किसी सोच के गलियारों में, नदी के हर किनारों में। अक्सर तुम याद आ जाते हो।   मेरे लफ्ज़ के हर एक अल्फ़ाज़ में, किसी गजल के साज़ में। हर शायर के शायरी में, मेरी वो पुरानी डायरी में। अक्सर तुम याद आ जाते हो।   पता है, अक्सर तुम याद आ जाते हो।
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ये ज़िन्दगी

ये ज़िन्दगी
चला था ढूंढने कागजों में जिन्दगी, पुरानी डायरी के पीले पन्नों को देखा, खुशियों की बहार थी जिन्दगी। शब्दों में पिरोया करता था उसे, जिसे माना था अपनी ज़िन्दगी।   वक़्त के रफ़्तार में चलते चलते, अब कुछ खामोश है ज़िन्दगी। ढूंढता रहा खोए लफ़्ज़ों को,  करता रहा उससे बंदगी।   अब कहा दिल ने यही, बड़ी दिलचस्प कहानी है जिन्दगी। लिखूं अब मैं कैसे! कहूं अब मैं कैसे! शब्दों से बाहर की कहानी है जिन्दगी।
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एक शाम

एक शाम
तू देखती है क्यों चाँद को छुप छुप कर, देख ले खुद को मेरे आँखों में जी भरकर।   आज तुझे तो देख चाँद भी शरमाएगा, बिन पर्दा ना जा, ये घटा बाहर फिर कैसे आएगा।   छोर दो ज़िद अपनी, अब तो मेरे करीब तू आ जा, मिला साथ तुम्हारा, मेरे बाहों में तू समां जा।   तेरे ख्वाबों से अपनी मैं शाम सजाता हूँ, हर कागज पे तेरा नाम, हर बार लिख जाता हूँ।
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